मंगलवार, 14 सितंबर 2021

About Heailth & Fitness ( स्वास्थ्य):

 जीवन की जिन अवस्थाओं का उपर वर्णन किया गया है । उन सभी अवस्थाओं में समय,जलवायु, परिस्थिति आदि के अनुकूल और प्रतिकूल मानव जीवन में  पड़ता है। जैसे सर्दी, जुकाम, बुखार (ज्वर ) तथा पौष्टिकता कि कमी से होने वाली बीमारियां ।

इन बिमारियों से उबरने के लिए अल्लाह ने ( ईश्वर ने ) प्रकृति में असंख्य जड़ी बूटियाँ पैदा की जिसे हम व्यवहार कर हम हमेशा तंदुरुस्त ( स्वस्थ) रहा सकते हैं । इसके लिए हमें अपना डाॅक्टर खुद होना पड़े गा । खुद का डाॅक्टर होना कोई बड़ी बात नहीं। हमारा शरीर है,हमें शर्दी होने पर कैसा लगता है हमसे अच्छा कोई डाक्टर नहीं समझ सकता। अतः अगर हमें कूछ प्राकृतिक जड़ी - बूटियों ज्ञान हो तो हम अपना और अपने परिवार का खुद कर सकते हैं । अनुभव रखना कोई बड़ी बात नहीं है ।ज्ञान बढ़ाने के लिए सतत प्रयास रत रहना चाहिए । इसके बाद हम आपलोगों को जीवन की जिन तीन अवस्थाओं का वर्णन किया उपर बता चुके हैं, उन अवस्थाओं में हम साधारण बीमारियों से किस प्रकार से निजात पाकर स्वास्थ्य रह सकते हैं, जो बिलकुल आशान और घरेलू है। इसके बारे में हम अगला          बलाॅ ग में आपलोगों को जानकारी देंगे।


गुरुवार, 2 सितंबर 2021

जीवन की अवस्था

 जन्म के प्रथम क्षण से प्राकृतिक मृत्यु की अन्तिम हिचकी तक मानव को आयु की तीन मंजिलों से गुजरना पड़ता है।

1. आयु की मंजिलें 

    1.1 पहली मंजिल 

    1.2 दूसरी मंजिल 

    1.3 तीसरी मंजिल 

 1.1 पहली मंजिल : पहली मंजिल का नाम बचपन है। इस अवस्था में सारे अंग कच्चे और अपूर्ण (अपरिपक्व ) होते हैं । मस्तिष्क एवं मानसिक शक्तियां बंद कलियों की भांति तहों में लिपटी रहती है तथा यौवन क्रियाएं भी 6 से 10 वर्ष की तक निष्क्रिय रहती है या गहरी सोयी रहती है। 

मगर इस आधुनिक युग में  media, WhatsApp, YouTube, T.V. में अश्लीलता के कारण 6 से 10 के बच्चों में यौवन क्रियायां समय से पहले दृष्टिगोचर हो रही है ।

 1.2 दूसरी मंजिल  : इस मंजिल का नाम यौवन ( जवानी ) है। इस अवस्था में शरीर परिपक्वता की उन सीमाओं में दाखिल हो जाता है जहां उसे अपनी रचना के वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान होता है ।

जीवन के पौधे पर बचपन के नाम से जो कली झूल रही थी वह खिल कर फूल बन जाती है। उसकी महक मन में एक विचित्र प्रकार की मादकता भर देती है,उमंगें जागृत हो जाती है तथा विपरीत लिंगी आकर्षण वाली भावनायें जो दस -बारह वर्ष की आयु से ही उभरना शुरू हो जाती है और 16 से 20 वर्ष की आयु तक परिपक्वता के दर्जे में पहुँच जाती है।

काम आकर्षण पुरूष के मन में स्त्री और स्त्री के हृदय में पुरुष के मिलन, समर्पण की बेचैन भावनायें जगा देता है। मन-मस्तिष की शक्तियां भी जाग उठती हैं। 

उनके स्नायुओं सख्ती और झनझनाहट पैदा हो जाती है। रक्त से भरी हुई नाड़ियां दिन रात उमंगों और इच्छाओं को जन्म देती रहती हैं तथा दिल व दिमांग में सौन्दर्य एवं यौवन से दिलचस्पी लेने की प्राकृतिक इच्छाओं का बहाव होता रहता है। 

1.3 तीसरी मंजिल: इसे बुढ़ापा कहते हैं । इसमें जवानी का कुम्हला जाता है। तथा उसमें सुगंध नहीं रहती। यौवन का तुफान उतर जाता है । दिल व दिमाग पर निराशा छा जाती है। स्नायुवों की फौलादी शक्तियां समाप्त हो जाती हैं, नाड़ियां रक्त से खाली हो जाती हैं तथा कामेच्छायें दम तोड़ देतीं हैं ।

इन्सान के अंग जो यौवन में परिपक्वता के स्तर तक पहुँचे थे वह विघटित होने लगते हैं जैसे सूर्य दोपहर के बाद पश्चिम की ओर ढलने लगता है।या जैसे सागर चढ़ाव के पश्चात उतरना आरम्भ हो जाता है । इस आयु में उमंगें और इच्छायें सूखे पौधे की भांति शुष्क हो जाती है।



Introduction


Introduction on Health : दोस्तो मैं 2012-13में ही अपना ब्लॉग किसी मकसद से बनाया था। मगर सांसारिक उलझन के कारण मैं उसमें कूछ लिख न सका । उलझन का मूख्या कारण यह था कि मेरा एक छोटा बच्चा जिसका नाम था तफहीम आलम। वह Thalassemia Major से पीड़ित था। 2003 - 2021 तक मैं उसके इलाज के पीछे मैं व्यस्त रहा । मगर मैं  उसे जीवित न रख सका । इलाज के पूरे काल में हमें यह महसूस हुआ कि इलाज के समय अगर आप को स्वास्थ्य ज्ञान नहीं हो तो आपका जिंदगी तबाह हो जाएगी । हमने पाया कि एलोपैथिक इलाज आप को कुछ क्षेत्रों में आपको स्वास्थ्य लाभ तो देता है,मगर इसके विपरीत दूसरे तरफ आपके स्वास्थ्य पर बहुत बूरा असर पड़ता है ।

उदाहरण स्वरूप मेरे बच्चे को ब्लड ट्रांसफ्यूजन से जिंदगी तो मिल रही थी मगर दूसरे तरफ केमिकल के प्रभाव से spleen & liver ( प्लीहा एवं लिवर) पर बहुत बूरा असर पड़ा जो हमें बहुत देर में समझ आइ । जिसका एलोपैथि में  संतुष्टि पूर्ण इलाज नहीं है । थैलेसिमीया ट्रीटमेंट में 25% बच्चों के साथ एसा ही होता है। हृदय रोग, थाॅयरायड, शुगर आदि भिन्न-भिन्न रोग हो जाया करता है । अगर प्रारंभ से केमिकल्स के असर को खत्म करने के लिए नैचरोपैथिक एवं आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट किया जाए तो रोगी को बेहतर जिंदगी दिया जा सकता है ।

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