जन्म के प्रथम क्षण से प्राकृतिक मृत्यु की अन्तिम हिचकी तक मानव को आयु की तीन मंजिलों से गुजरना पड़ता है।
1. आयु की मंजिलें
1.1 पहली मंजिल
1.2 दूसरी मंजिल
1.3 तीसरी मंजिल
1.1 पहली मंजिल : पहली मंजिल का नाम बचपन है। इस अवस्था में सारे अंग कच्चे और अपूर्ण (अपरिपक्व ) होते हैं । मस्तिष्क एवं मानसिक शक्तियां बंद कलियों की भांति तहों में लिपटी रहती है तथा यौवन क्रियाएं भी 6 से 10 वर्ष की तक निष्क्रिय रहती है या गहरी सोयी रहती है।
मगर इस आधुनिक युग में media, WhatsApp, YouTube, T.V. में अश्लीलता के कारण 6 से 10 के बच्चों में यौवन क्रियायां समय से पहले दृष्टिगोचर हो रही है ।
1.2 दूसरी मंजिल : इस मंजिल का नाम यौवन ( जवानी ) है। इस अवस्था में शरीर परिपक्वता की उन सीमाओं में दाखिल हो जाता है जहां उसे अपनी रचना के वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान होता है ।
जीवन के पौधे पर बचपन के नाम से जो कली झूल रही थी वह खिल कर फूल बन जाती है। उसकी महक मन में एक विचित्र प्रकार की मादकता भर देती है,उमंगें जागृत हो जाती है तथा विपरीत लिंगी आकर्षण वाली भावनायें जो दस -बारह वर्ष की आयु से ही उभरना शुरू हो जाती है और 16 से 20 वर्ष की आयु तक परिपक्वता के दर्जे में पहुँच जाती है।
काम आकर्षण पुरूष के मन में स्त्री और स्त्री के हृदय में पुरुष के मिलन, समर्पण की बेचैन भावनायें जगा देता है। मन-मस्तिष की शक्तियां भी जाग उठती हैं।
उनके स्नायुओं सख्ती और झनझनाहट पैदा हो जाती है। रक्त से भरी हुई नाड़ियां दिन रात उमंगों और इच्छाओं को जन्म देती रहती हैं तथा दिल व दिमांग में सौन्दर्य एवं यौवन से दिलचस्पी लेने की प्राकृतिक इच्छाओं का बहाव होता रहता है।
1.3 तीसरी मंजिल: इसे बुढ़ापा कहते हैं । इसमें जवानी का कुम्हला जाता है। तथा उसमें सुगंध नहीं रहती। यौवन का तुफान उतर जाता है । दिल व दिमाग पर निराशा छा जाती है। स्नायुवों की फौलादी शक्तियां समाप्त हो जाती हैं, नाड़ियां रक्त से खाली हो जाती हैं तथा कामेच्छायें दम तोड़ देतीं हैं ।
इन्सान के अंग जो यौवन में परिपक्वता के स्तर तक पहुँचे थे वह विघटित होने लगते हैं जैसे सूर्य दोपहर के बाद पश्चिम की ओर ढलने लगता है।या जैसे सागर चढ़ाव के पश्चात उतरना आरम्भ हो जाता है । इस आयु में उमंगें और इच्छायें सूखे पौधे की भांति शुष्क हो जाती है।